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मई को जब पूरा देश लोकसभा
चुनावो के
नतीजे देखने
में मस्त
था उसी
समय हमारी
सुप्रीम कोर्ट
एक फैसला
सुना रही
थी.. सुप्रीम
कोर्ट ने
Altaf Malek , Adambhai Ajmeri, Mohammed
Salim Hanif Sheikh, Abdul Qaiyum Muftisaab Mohmed Bhai, Abdullamiya Yasinmiya, और Chand Khan को अक्षरधाम
मंदिर पर
हमले के
मामले में
बाइज़्ज़त बरी
किया और
इन निर्दोष
लोगो को
फसाने के
लिए गुजरात
पुलिस और
राज्य के
गृह मंत्रालय
को लताड़
भी लगायी..
जब कोई
मुस्लिम किसी
आतंकवादी घटना
के लिए
गिरफ्तार किया
जाता है
तो मीडिया
चिल्लाने लगती
है कि
देखो ‘आतंकवादी
गिरफ्तार, आतंकवादी गिरफ्तार’ और साथ
ही पुलिस
और जाँच
एजेंसियों की तारीफों के पुल
भी बांध दिए
जाते है
... अक्षरधाम मंदिर पर हुए आतंकी
हमले में
भी यही
हुआ, मामले
की जाँच
हुई कुछ
लोग गिरफ्तार
हुए... स्पेशल
कोर्ट (POTA ) ने उन लोगो को
सजा भी
सुनाई, हाई
कोर्ट ने
उनकी सजा
को कन्फर्म
भी किया
फिर मामला
सुप्रीम कोर्ट
पंहुचा.. सुप्रीम
कोर्ट ने
सभी की
सजा को
निरस्त कर
दिया है
, उन सभी
को इनोसेंट
बताया है..
लेकिन सवाल
ये है
की क्या
उन छह
लोगो को
केवल बरी
कर देने
से उनकी
जिंदगी का
वो एक
एक पल
उन्हें वापस
मिल जायेगा
जो उन्होंने
जेल या
पुलिसिया प्रताड़ना
के बीच
गुजारी है
? क्या ये
मीडिया, पुलिस,
सरकार और
न्यायपालिका उन लोगो के परिवार
वालो को
हुई उस
मानसिक प्रताड़ना
का हिसाब
देंगे जो
उन्होंने पिछले
ग्यारह सालो
में एक
आतंकवादी के
परिवार के
सदस्य होने
के नाते
सही है?
और सवाल
ये भी
है कि
उनके साथ
ही ऐसा
क्यों किया
गया ? अपने
281 पेज के
जजमेंट में
सुप्रीम कोर्ट
इन सवालो
के जवाब
देने की
हिम्मत नहीं
दिखा पायी
लेकिन पता
नहीं मुझे
ऐसा क्यों
लगता है
कि वो
अगर मुसलमान
न होते
तो शायद
उनके साथ
ऐसा न
होता !
( To read the Judgement, please visit to supremecourtofindia.nic.in/outtoday/Crl.AppealNo.2295-2296of2010.pdf )